वो अदालत, जहां आरोपी नहीं कानून कटघरे में था : मदन लाल ढींगरा का कोर्ट में दिया गया वह बयान, जो इतिहास बन गया

Madan Lal Dhingra

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उस दिन लंदन की अदालत में सन्नाटा पसरा हुआ था। सामने ब्रिटिश साम्राज्य के सबसे बड़े न्यायाधीश बैठे थे, चारों ओर अंग्रेज अधिकारी और कटघरे में खड़ा था, एक 25 साल का भारतीय युवक। जिसके खिलाफ अत्याचारी ब्रिटिश सैन्य अधिकारी वायसराय विलियम हर्ट कर्जन वायली का वध करने के मामले पर सुनवाई चल रही थी। 

अंग्रेजों को पूरी आशा थी कि यह युवक कोर्ट के सामने झुकेगा, अपने अपराध पर पछतावा जताएगा और खुद को सजा पाने से बचाने के लिए दलीलें देगा। लेकिन अगले कुछ मिनटों में जो हुआ, उसने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिल गई क्योंकि उस युवक ने दलीलें देने के बजाए, ब्रिटिश सरकार की न्याय व्यवस्था को ही चुनौती दे डाली। यह युवा कोई और नहीं बल्कि भारत के महान क्रांतिकारी मदन लाल ढिंगरा थे।

उस दिन उन्होंने हर्ट कर्जन वायली के वध को सही बताते हुए जो कहा उससे स्पष्ट हो गया कटघरे में मदनलाल ढींगरा नहीं बल्कि साम्राज्यवादी ब्रिटिश सत्ता को होना चाहिए। 

यह घटना जुलाई 1909 की है। लंदन के इंपीरियल इंस्टीट्यूट में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान मदन लाल ढिंगरा ने ब्रिटिश अधिकारी सर विलियम हट कर्जन वाइली पर गोलियां चलाकर उसका वध कर दिया।

जिसके बाद उनकी गिरफ्तारी हुई और कोर्ट में पेश किया गया। जज ने जैसे ही उन पर ‘जानबूझकर हत्या’ का आरोप पढ़ा गया, ढिंगरा ने तुरंत कहा- ‘यह शब्द मेरे पर लागू नहीं होता। मैंने कोई अपराध नहीं किया था, बल्कि देशभक्ति और न्याय का कार्य किया है।’ 

कोर्ट में बैठे जज उन्हें बार-बार कानूनी प्रक्रिया के अनुसार उत्तर देने को कहते रहे, लेकिन ढिंगरा का दृष्टिकोण बिल्कुल अलग था। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वह ब्रिटिश के कानून को नहीं मानते, बल्कि मैं इस एक राजनीतिक संघर्ष के रूप में देख रहा हूं। ढिंगरा ने कोर्ट में कहा यह व्यक्तिगत अपराध का मामला नहीं था, बल्कि भारत की गुलामी के विरुद्ध प्रतिरोध का प्रतीक था।

मदन लाल ढिंगरा अपनी बातों पर इस प्रकार अडिग थे कि उन्होंने कोर्ट में सुनवाई के दौरान किसी भी वकील को नियुक्त करने से साफ मना कर दिया। साथ ही उन्होंने कहा कि अंग्रेजी कानून के अनुसार हर आरोपी को अपना बचाव करने का अधिकार है, इसलिए मैं इस अधिकार का भी उपयोग नहीं करूंगा। क्योंकि वह किसी भी प्रकार से अंग्रेजी कानून को नहीं मानेंगे।

ढिंगरा का मानना था कि जिस सत्ता ने भारत को गुलाम बनाया है, उसकी अदालत से न्याय की उम्मीद करना ही व्यर्थ है। यही कारण था कि उन्होंने गवाहों से कोई सवाल नहीं किया, अभियोजन पक्ष की दलीलों को चुनौती नहीं दी और न ही सजा से बचने के लिए कोई कानूनी तर्क रखा। वे केवल अपना संदेश दुनिया तक पहुंचाना चाहते थे।

जब कोर्ट ने उन्हें अपनी बात रखने का ढींगरा को अवसर दिया, तब उन्होंने ऐतिहासिक बयान दिया, जिसने उन्हें भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का अमर प्रतीक बना दिया। मदन लाल ढिंगरा ने कहा कि किसी भी ब्रिटिश कोर्ट को मुझे गिरफ्तार करने, जेल में रखने या मुझे मृत्यु दंड की सजा सुनाने का कोई अधिकार नहीं है।

उनका यह बयान ब्रिटिश शासन की वैधता पर सीधा प्रहार था। उन्होंने तर्क दिया कि यदि किसी अंग्रेज के लिए जर्मनों द्वारा ब्रिटेन पर कब्जा करने की स्थिति में उनके खिलाफ लड़ना देशभक्ति है, तो मेरे मामले में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ना कहीं अधिक देशभक्तिपूर्ण है। 

ढिंगरा ने कोर्ट में ब्रिटिश साम्राज्य पर भारत के आर्थिक शोषण, क्रांतिकारियों को फांसी देने और भारतीय जनता पर अत्याचार करने के आरोप लगाए। उन्होंने ब्रिटिश सरकार की क्रूरता उजागर करते हुए कहा कि अंग्रेज 8 करोड़ भारतीयों की हत्या के लिए जिम्मेदार हैं, वह भारत से हर साल 10 करोड़ पाउंड ले जाते हैं। इसलिए वे दया की भीख मांगने नहीं आए हैं, बल्कि अपने उद्देश्य की न्यायसंगतता साबित करने आए हैं।

मदनलाल ढीगरा के इस बयान के बाद ब्रिटिश सरकार ने उनके मुकदमे से जुड़ी खबरों को मीडिया में छापने पर प्रतिबंध लगा दिया।

अंततः कोर्ट ने उन्हें दोषी करार दिया। अब कोर्ट की अंतिम प्रक्रिया बाकी थी। न्यायालय के क्लर्क ने उनसे पूछा कि क्या उनके पास कोई ऐसा कारण है जिसके आधार पर उन्हें मृत्युदंड न दिया जाए।

यही वह क्षण था, जब मदन लाल ढिंगरा ने अंग्रेजी कानून को सबसे बड़ी चुनौती दी। उन्होंने निर्भीक स्वर में कहा, ‘मैंने तुम्हें बार-बार कहा है कि मैं न्यायालय के अधिकारों को नहीं मानता। तुम जो चाहो कर सकते हो। मुझे कोई आपत्ति नहीं। तुम मुझे मृत्युदंड दे सकते हो। ढींगरा को अपनी जान बचाने का आखिरी मौका गंवाते देख कोर्ट रूप में उपस्थित लोग स्तब्ध रह गए।

एक ऐसा व्यक्ति, जिसके सामने मौत खड़ी थी, फिर भी वह अपने विचारों पर अडिग था। मदन लाल ढिंगरा के कोर्ट में अंतिम शब्द थे, “आज भले ही अंग्रेज शक्तिशाली हों, लेकिन एक दिन भारतीयों की भी बारी आएगी।”

अंततः अदालत ने उन्हें फांसी की सजा सुना दी। लेकिन फैसला सुनने के बाद भी मदन लाल ढिंगरा के चेहरे पर भय का कोई निशान नहीं था। जब उन्हें अदालत से बाहर ले जाया जा रहा था, तब उन्होंने गर्व से कहा, “धन्यवाद, मेरे प्रभु। मुझे अपनी मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति देने का गौरव प्राप्त है।” यह केवल एक क्रांतिकारी का अंतिम वक्तव्य नहीं था, बल्कि गुलाम भारत की आत्मा की आवाज थी। 

मदन लाल ढिंगरा ने कोर्ट में स्वयं को बेगुनाह साबित करने का प्रयास नहीं किया, क्योंकि उनका लक्ष्य सजा से बचना नहीं था। बल्कि दुनिया को यह बताना था कि भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले क्रांतिकारी अंग्रेजी सत्ता और उसके कानून को वैध नहीं मानते। अंग्रेजों के गढ़ लंदन की उस कोर्ट में खड़े होकर उन्होंने जिस साहस से ब्रिटिश न्याय व्यवस्था को चुनौती दी, उसने उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमर बना दिया।