अरावली की पथरीली चट्टानों में आज भी एक वीर योद्धा की शौर्य गाथा गूंज रही है। यह गाथा है एक ऐसे वीर राजा की, जिसने वैभव से भरे महलों को छोड़कर, जंगलों को अपना घर बनाया। वह भी सिर्फ राष्ट्र के स्वाभिमान की रक्षा के लिए। यह शौर्य गाथा है, मेवाड़ के राजा वीर महाराणा प्रताप की।
हल्दीघाटी के युद्ध (1576) में महाराणा प्रताप की छोटी सी सेना ने मुगल आक्रांता अकबर की विशाल सेना के सामने वीरता से युद्ध किया। हजारों मुगल सैनिक मारे गए। लेकिन मुगलों के अपेक्षा प्रताप की सेना आधी भी नहीं थी। जिसके चलते महाराणा प्रताप ने मुगल सेना के साथ गुरिल्ला युद्ध करने की रणनीती बनाई, इसके लिए उन्हें अरावली की पहाड़ियों पर अपनी सेना व परिवार के साथ शरण लेनी पड़ी।
इन्हीं कठिन दिनों में ‘घास की रोटी’ का प्रसिद्ध प्रसंग सामने आता है। लेकिन यह केवल भूख और अभाव की कहानी नहीं थी, बल्कि एक ऐसे संकल्प की कहानी थी, जिसने प्रताप को इतिहास में अमर कर दिया।
हल्दीघाटी के बाद प्रताप के सामने दो रास्ते थे, या तो मुगलों के सामने झुक जाना या फिर जंगलों में रहकर संघर्ष को जारी रखना। प्रताप ने दूसरा रास्ता चुना। उन्होंने संकल्प लिया कि जब तक चित्तौड़ दुर्ग को अकबर से पुनः स्वतंत्र नहीं करा लेंगे, तब तक राजसी जीवन नहीं जिएंगे। सोने-चांदी के बर्तनों का त्याग, पत्तों की थालियों में भोजन, पुआल की चटाई पर विश्राम और दाढ़ी न काटने का प्रण। यह सब उनके तपस्वी जीवन का हिस्सा बन गया।
इन्हीं दिनों में महाराणा प्रताप को भोजन का भी संकट देखना पड़ा। अकबर ने अरावली तक पहुंचने वाले संपर्क मार्गों को काट रखा था, ताकि महाराणा प्रताप और उनकी सेना तक, अन्न का एक दाना भी नहीं पहुंच सके। तब प्रताप, उनके परिवार और सहयोगियों को ‘घास की रोटी’ खानी पड़ी। लेकिन यह केवल अभाव की कहानी नहीं थी, इसके पीछे एक गहरी रणनीति भी थी।
वास्तविकता में जिस ‘घास’ का उल्लेख लोक कथाओं और कविताओं में मिलता है, वह साधारण घास नहीं थी। वह वास्तव में अरावली के जंगलों में उगने वाला जंगली अनाज था, जिसमें विशेषकर जंगली बाजरा (समा) और तोरकी या गारी कहलाने वाले पौधे के बीज थे। इस कठिन समय में प्रताप और उनकी सेना इन्हीं बीजों को पीसकर आटा तैयार करती, फिर उस आटे से रोटियां बनाई जाती थीं। देखने में यह साधारण रोटियां थीं, पर वास्तव में यह एक शक्तिशाली आहार था। जंगली बाजरा जल्दी उगने वाला अनाज था और गारी के बीजों में भरपूर प्रोटीन पाया जाता था। यह वही भोजन था, जिसने अभाव में भी पहाड़ों में लड़ने वाली प्रताप की सेना को शक्ति दी।
6 वर्षों तक महाराणा प्रताप अपनी सेना और परिवार के साथ अरावली की पहाड़ियों पर रहे। यह धरती स्वयं प्रताप की सहयोगी बन गई। यहां की चट्टानों की दरारों में उगने वाला जंगली अनाज बिना खेती के भी पनप जाता था।
जंगली बाजरा, लगभग 45-60 दिनों में तैयार हो जाता था। जिसे खाकर प्रताप के सैनिकों को लगातार ऊर्जा मिलती थी। वहीं गारी के बीजों में उच्च प्रोटीन, मांसपेशियों की शक्ति बनाए रखने में सहायक थी। यही कारण था कि घास की रोटी केवल मजबूरी नहीं, बल्कि एक बुद्धिमान रणनीति भी थी।
जब मुगल सेना भारी रसद और लंबी आपूर्ति पर निर्भर थी, तब प्रताप और उनकी सेना जंगलों की इस प्राकृतिक ‘पेंट्री’ से अपना भोजन प्राप्त कर लेते थे। साथ ही वह स्वयं को सभी विषम परिस्थितियों के अनुसार ढाल भी रहे थे।
इन कठिन परिस्थितियों में भी प्रताप अकेले नहीं थे। मेवाड़ की पहाड़ियों में रहने वाली भील जनजाति उनके साथ खड़ी थी। आसपास के गांवों और जंगलों में उपलब्ध जंगली फल, बीज और अनाज प्रताप की सेना के लिए जीवनरेखा बन गए। साथ ही उनके विश्वस्त मंत्री भामा शाह ने भी धन और संसाधनों की व्यवस्था कर प्रताप को नई शक्ति दी।
धीरे-धीरे प्रताप ने गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई। मुगल सेना पर छोटे-छोटे हमले, पहाड़ी रास्तों का उपयोग कर अचानक आक्रमण। महाराणा प्रताप की यही रणनीति मुगल सेना के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई।
समय बीतता गया, लेकिन प्रताप का संकल्प नहीं टूटा। अंततः 1582 में देवेर के युद्ध में उन्होंने मुगल चौकियों पर निर्णायक आक्रमण किया। गुरिल्ला युद्ध की रणनीति, पहाड़ी भूगोल के ज्ञान और जंगली अनाज की रोटियों की ताकत से महाराणा प्रताप ने दिवेर से लेकर गोगुंदा तक के 36 ठिकानों पर फिर से कब्जा कर लिया।
आक्रांता अकबर की सेना भाग खड़ी हुई। धीरे-धीरे मेवाड़ का अधिकांश भाग फिर से महाराणा प्रताप के नियंत्रण में आ गया, अकबर कभी भी पूरे मेवाड़ पर पूर्ण अधिकार नहीं कर सका।
अरावली की घाटियों में खाई गई उन्हीं ‘घास की रोटियों’ ने प्रताप को झुकने नहीं दिया। वह रोटी केवल भोजन नहीं, अपितु स्वाभिमान, धैर्य और स्वतंत्रता की प्रतीक बन गई।
यही कारण है कि महाराणा प्रताप का नाम आज भी उस वीर राजा के रूप में लिया जाता है, जिसने जंगलों की कठिनाइयों में रहकर घास के बीजों से बनी रोटियां खाईं, लेकिन फिर भी अपने स्वाभिमान के साथ समझौता नहीं किया। उस वीर ने अपनी वीरता के दम पर मेवाड़ की धरती को अंततः मुस्लिम आक्रांता अकबर से फिर से स्वतंत्र करा लिया।

