93 दिन, तीन आतंकवादी और एक मिशन : भारत के ‘ऑपरेशन महादेव’ की इनसाइड स्टोरी—वह तलाशी,जिसने पहलगाम हमले का बदला लिया

Operation Mahadev

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एक साल पहले, 22 अप्रैल 2025 को, जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में स्थित बैसरन घाटी के शांत घास के मैदान एक खौफनाक जगह में बदल गए थे, जब पाकिस्तान-समर्थित आतंकवादियों के एक क्रूर आतंकी हमले में 26 निर्दोष लोगों की जान चली गई थी। यह एक सुनियोजित हमला था, पहले हिंदू पुरुषों को अलग किया गया और फिर उनकी पत्नियों, बच्चों और परिवारों के सामने ही उन्हें बेहद करीब से गोली मार दी गई। 

लेकिन भारत न तो इसे भूला, और न ही उन्हें माफ किया। इसके बाद के हफ्तों में, एक दृढ़ और व्यवस्थित जवाबी कार्रवाई ने आकार लेना आरम्भ किया, जिसका नतीजा ‘ऑपरेशन महादेव’  नाम के एक बेहद सटीक आतंकवाद-रोधी अभियान के रूप में सामने आया।  इस अभियान ने यह सुनिश्चित किया कि इस हमले के लिए जिम्मेदार लोगों को ढूढ़ निकाला जाए और उन्हें सजा दिलाई जाए। आज, हम विस्तार से बता रहे हैं कि यह पूरा ऑपरेशन कैसे अंजाम दिया गया और इस क्रूर हमले के दोषियों को कैसे सजा के कटघरे तक पहुंचाया गया।

पहलगाम आतंकी हमले का स्थल। फोटो क्रेडिट : फ्रंटलाइन

शुरुआती 48 घंटे

हमले के कुछ ही घंटों के भीतर, सुरक्षा बल तेजी से घटना स्थल पर पहुंच गए। हमले के अगले दिन, एक उच्च-स्तरीय सुरक्षा बैठक बुलाई गई, जिसमें भारतीय सेना, CRPF और जम्मू-कश्मीर पुलिस शामिल थीं। बैठक का मकसद साफ था, हमलावर देश से बचकर नहीं निकलने चाहिए। इसके साथ ही, शुरुआती जांच शुरू हो गई।

घटनाओं के क्रम को फिर से समझने के लिए, बचे हुए लोगों के प्रत्यक्षदर्शी बयानों को तकनीकी खुफिया जानकारियों के साथ मिलाया गया। बहुत कम समय में ही हमलावरों की पहचान तीन पाकिस्तानी आतंकवादियों के रूप में हो गई, सुलेमान (जिसे फैजल जट भी कहा जाता है), हमजा अफगानी और जिब्रान। ये तीनों ही लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े थे, जो भारत में सीमा पार आतंकवाद से लंबे समय से जुड़ा एक आतंकी संगठन है। सुलेमान, जो ‘A’ श्रेणी का कमांडर था, की पहचान पहलगाम हमले के पीछे के मुख्य साजिशकर्ता के रूप में हुई। बाकी लोग भी खूंखार आतंकी थे, जो पहले भी हिंसक वारदातों में शामिल रहे थे। पहचान की पुष्टि होने के बाद, रणनीति उन्हें घेरने पर केंद्रित हो गई।

मुठभेड़ के दौरान तीन आतंकवादी मारे गए और गोला-बारूद बरामद किया गया। फोटो क्रेडिट: NDTV

सुरक्षा बलों ने कश्मीर घाटी में आतंकवादियों के भागने के संभावित रास्तों को सील कर दिया, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि आतंकवादी सीमा पार करके पाकिस्तान न भाग सकें।

आतंकियों की तलाश शुरू

असली पीछा हमले के एक महीने बाद, 22 मई 2025 को शुरू हुआ, जब पहली भरोसेमंद खुफिया जानकारी सामने आई। इंटेलिजेंस ब्यूरो को मानवीय खुफिया जानकारी (HUMINT) मिली, जिससे पता चला कि दाचीगाम इलाके में आतंकियों की मौजूदगी है। 1,000 से ज्यादा लोगों से, जिनमें स्थानीय लोग, टट्टू चलाने वाले और यहां तक कि पर्यटक भी शामिल थे, 3,000 घंटे से ज्यादा समय तक पूछताछ की गई। उस समय से, ‘ऑपरेशन महादेव’ एक लगातार चलने वाली, कई स्तरों वाली तलाशी मुहिम में बदल गया। इसके साथ ही, तकनीकी खुफिया जानकारी (TECHINT) पर भी साथ-साथ काम किया गया। ड्रोन, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर, थर्मल इमेजिंग सिस्टम और सैटेलाइट ट्रैकिंग जैसे आधुनिक निगरानी उपकरणों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। यहां तक कि चीनी मूल के रेडियो उपकरणों का इस्तेमाल करके की गई एन्क्रिप्टेड बातचीत को भी इंटरसेप्ट किया गया, जिससे आतंकियों की हरकतों का पता लगाने में मदद मिली। इसी बीच, राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने उन स्थानीय मददगारों को गिरफ्तार कर लिया, जिन्होंने आतंकियों को पनाह और साजो-सामान से जुड़ी मदद उपलब्ध कराई थी।

तकनीकी और मानवीय खुफिया जानकारी की मदद से, आतंकवादियों का पता लगाया गया। वे दक्षिण कश्मीर के ऊपरी इलाकों से होते हुए हपतणार, बुगमार और त्राल से गुजर रहे थे और फिर दाचीगाम में महादेव रिज के पास घने जंगलों की ओर बढ़ रहे थे। इस जंगल के इलाके ने इसमें अहम भूमिका निभाई। शुरू में, इसने एक ढाल का काम किया, यहां की घनी वनस्पतियां और खड़ी ढलानों ने आतंकवादियों को तुरंत पकड़े जाने से बचने में मदद की। लेकिन जैसे-जैसे निगरानी कड़ी हुई, वही इलाका एक जाल में बदल गया, जिससे उनकी आवाजाही रुक गई और भागने के रास्ते सीमित हो गए। इस तरह, 10 जुलाई 2025 को, 300 वर्ग किलोमीटर के विशाल इलाके में शुरू हुई तलाशी धीरे-धीरे 25 वर्ग किलोमीटर के दायरे तक सिमट गई, क्योंकि सुरक्षा बल आतंकवादियों का कदम-दर-कदम पीछा करते हुए, धीरे-धीरे उनकी जगह को सीमित करते गए। इस मोड़ पर, अतिरिक्त बल तैनात किए गए, जिनमें एलीट पैरा (स्पेशल फोर्सेज) यूनिट और राष्ट्रीय राइफल्स शामिल थे।

22 जुलाई 2025 तक, समन्वित कार्रवाई शुरू की गई, जब सेंसरों ने आधिकारिक तौर पर लिडवास जंगल क्षेत्र (दाचीगाम/हरवान) में आतंकवादियों की मौजूदगी की पुष्टि कर दी। भागने के रास्तों को सुनियोजित तरीके से बंद कर दिया गया और आतंकवादियों को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया गया।

28 जुलाई, 2025 : अंतिम कार्रवाई

यह सफलता 26 जुलाई को मिली, जब खुफिया एजेंसियों ने एक मोबाइल सिग्नल को इंटरसेप्ट किया। थके-हारे और रसद की कमी से जूझ रहे आतंकवादियों ने अपने आकाओं से संपर्क करने के लिए कुछ देर के लिए अपना फोन चालू किया था और अनजाने में ही अपनी लोकेशन बता दी थी। इस अहम जानकारी के आधार पर, 28 जुलाई, 2026 को अंतिम चरण की कार्रवाई शुरू की गई। पैरा स्पेशल फोर्सेज के कमांडो को अंधेरे की आड़ में हवाई मार्ग से पहाड़ी इलाके में उतारा गया। इसी बीच, राष्ट्रीय राइफल्स ने इलाके की कड़ी घेराबंदी कर ली, ताकि कोई भी बचकर न निकल सके।

 रात भर की तैयारी के बाद, कमांडो ने आतंकवादियों की नजर से बचने के लिए, जमा देने वाली ठंड और मुश्किल ऊंची-ऊंची जगहों पर, 10 घंटों में पैदल लगभग 3 किलोमीटर का सफर तय किया। 28 जुलाई को सुबह लगभग 8:00 बजे, ड्रोन से की गई निगरानी से आतंकवादियों की ठीक-ठीक जगह का पता चला। उस समय वे अपने तंबुओं के अंदर सो रहे थे और उन्हें पास पहुंच रही सेना की कोई भनक नहीं थी। सुबह 9:30 बजे, राष्ट्रीय राइफल्स (RR) के जवान और पैरा स्पेशल फोर्सेज महादेव पहाड़ी की ओर बढ़े और उन्होंने आतंकवादियों की पहचान करना शुरू कर दिया। सुरक्षा बलों और आतंकवादियों के बीच जबरदस्त मुठभेड़ सुबह 11:00 बजे शुरू हुई और कुछ ही मिनटों के अंदर तीन आतंकवादियों को मार गिराया गया।
घटनास्थल से बरामद वस्तुएं, फोटो क्रेडिट : लोकमत मराठी न्यूज

यह ऑपरेशन सिर्फ मुठभेड़ के साथ ही खत्म नहीं हुआ, बल्कि इसके पीछे पक्के सबूत भी थे। बैलिस्टिक टेस्ट से यह पक्का हो गया कि पहलगाम हमले की जगह से मिले कारतूस, आतंकवादियों से जब्त की गई राइफलों, दो AK-सीरीज राइफलें और एक M4 से मेल खाते थे। वहां से पाकिस्तानी वोटर ID कार्ड और पाकिस्तान में बनी चॉकलेट भी मिलीं। आतंकवादियों में से एक की पहचान पाकिस्तानी सेना के एक पूर्व कमांडो के तौर पर हुई। इससे यह बात बिना किसी शक के साबित हो गई कि मारे गए लोग ही पहलगाम नरसंहार के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार थे।

एक रणनीतिक संदेश

ऑपरेशन महादेव केवल एक कामयाब आतंकवाद-विरोधी ऑपरेशन ही नहीं था, बल्कि यह एक रणनीतिक संदेश भी था। इसने इस बात को फिर से मजबूत किया कि भारत की आत्मा पर होने वाले हर आतंकी हमले को न तो भुलाया जाएगा और न ही माफ किया जाएगा। इसने यह दिखाया कि हर आतंकवादी का पीछा किया जाएगा और उसे खत्म कर दिया जाएगा, चाहे इसमें कितना भी समय लगे या इलाका कितना भी दुर्गम क्यों न हो। यह पाकिस्तान-समर्थित आतंकी नेटवर्क के लिए भी एक निर्णायक संदेश था कि सीमा पार से होने वाले आतंकवाद का जवाब जरूर दिया जाएगा।

और, सबसे अहम बात यह कि इसने पहलगाम के पीड़ितों को इंसाफ दिलाया। 22 अप्रैल से 28 जुलाई तक चले 93 दिनों के इस ऑपरेशन ने आतंकवाद-विरोधी कार्रवाई का एक नया मॉडल पेश किया, एक ऐसा मॉडल जिसमें सटीक खुफिया जानकारी, तकनीकी श्रेष्ठता और बेजोड़ मानवीय सहनशक्ति का मेल था।