1940 के दशक में भारत का स्वाधीनता संग्राम अपने चरम पर था। जहां एक ओर क्रांतिकारी अंग्रेजों से लड़ते हुए, अपने प्राणों की आहुति दे रहे थे, तो दूसरी ओर सत्ता के गलियारों में कुछ ऐसी कहानियां भी जन्म ले रही थीं, जिनकी चर्चा लंबे समय तक होती रही।
इन्हीं चर्चित घटनाओं में एक नाम बार-बार सामने आता है, जवाहर लाल नेहरू और भारत में अंतिम ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड लुईस माउंटबेटन की पत्नी एडविना का। जब देश स्वतंत्रता की लड़ाई के अंतिम दौर में था, नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे अनेक क्रांतिकारी अंग्रेजों से आरपार की लड़ाई लड़ते हुए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। यह क्रम आगे भी जारी था। लेकिन इस दौर में नेहरू और एडविना की निकटता चर्चा का विषय बन चुकी थी। तत्कालीन कई राजनेताओं, अधिकारियों और जीवनीकारों ने इन संबंधों का उल्लेख अपने संस्मरणों और किताबों में किया है, जिससे यह प्रेम कहानी इतिहास और राजनीति के बीच, एक विवादित अध्याय के रूप में दर्ज है।
नेहरू और एडविना एक साथ- इमेज सोर्स– postoast.com
मार्च 1947 में ब्रिटिश शासन ने अपने अंतिम वायसराय लॉर्ड लुईस माउंटबेटन को भारत भेजा, ताकि सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी की जा सके। उनके साथ उनकी पत्नी एडविना माउंटबेटन भी भारत आईं। एडविना पहले से ही ब्रिटिश समाज में एक प्रभावशाली और आकर्षक व्यक्तित्व के रूप में जानी जाती थीं। कहा जाता है कि भारत आने के कुछ ही दिनों के भीतर उनका परिचय जवाहरलाल नेहरू से हुआ और धीरे-धीरे दोनों के बीच एक गहरा भावनात्मक संबंध विकसित हो गया। उस समय के कई लोगों ने इस बढ़ती नजदीकी को नोटिस किया। यहां तक कि नेहरू के करीबी मौलाना अब्दुल कलाम आजाद ने अपनी पुस्तक India Wins Freedom में लिखा कि नेहरू लेडी माउंटबेटन से विशेष रूप से प्रभावित दिखाई देते थे।
नेहरू और एडविना की मित्रता धीरे-धीरे इतनी चर्चित हो गई कि दिल्ली और लंदन दोनों जगह इसके किस्से सुनाई देने लगे। इतिहासकार Stanley Wolpert ने अपनी प्रसिद्ध जीवनी “Nehru: A Tryst with Destiny” में लिखा कि दोनों के बीच सार्वजनिक समारोहों में भी एक असामान्य निकटता दिखाई देती थी। वहीं ब्रिटिश और भारतीय अधिकारियों की निजी डायरी में भी इन संबंधों के संकेत मिलते हैं। कहा जाता है कि वायसराय हाउस के स्विमिंग पूल में दोनों को साथ तैरते देखा गया, जिसके बाद इनकी दोस्ती को लेकर चर्चाएं और तेज हो गई थीं। उस समय यह भी कहा जाता था कि लॉर्ड माउंटबेटन स्वयं इस संबंध से अनजान नहीं थे, बल्कि उनकी शादी पहले से ही एक तरह की ‘ओपन मैरिज’ मानी जाती थी, जिसमें दोनों अपने-अपने सामाजिक जीवन स्वतंत्र रूप से जीते थे।
इन चर्चाओं को और बल तब मिला जब एडविना की बेटी Pamela Hicks ने बाद के वर्षों में अपनी पुस्तक Daughter of Empire : Life as a Mountbatten में स्वीकार किया कि उनकी मां और नेहरू के बीच गहरा प्रेम था। पामेला ने लिखा कि जब उनकी मां नेहरू के साथ होती थीं तो उनके भीतर एक अजीब-सी शांति दिखाई देती थी, मानो उन्हें वह बौद्धिक और भावनात्मक साथ मिल गया हो, जिसकी उन्हें लंबे समय से तलाश थी। कहा जाता है कि दोनों के बीच वर्षों तक पत्रों का आदान-प्रदान भी चलता रहा और नेहरू जब भी लंदन जाते, तो एडविना से अवश्य मिलते। इस प्रकार यह संबंध केवल भारत की स्वतंत्रता के समय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आने वाले वर्षों में भी चर्चा का विषय बना रहा।
समय बीतता गया और इतिहास के कई अध्याय बदलते गए, लेकिन नेहरू और एडविना की मित्रता की कहानी भी उसी तरह जीवित रही। 21 फरवरी 1960 को जब एडविना माउंटबेटन की अचानक मृत्यु हुई, तब इस संबंध की गहराई एक बार फिर दुनिया के सामने आई। एडविना की इच्छा थी कि मृत्यु के बाद उन्हें समुद्र के बीच दफनाया जाए। इस इच्छा के अनुसार ब्रिटिश नौसेना के जहाज HMS Wakeful से उनका ताबूत समुद्र में उतारा गया। लेकिन इस समुद्री दफन के दौरान एक ऐसी घटना हुई जिसने सबका ध्यान खींच लिया। भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय नौसेना का युद्धपोत INS त्रिशूल ब्रिटेन भेजा, जिसने एचएमएस वेकफुल के साथ चलते हुए समुद्र में एडविना को पुष्पांजलि अर्पित की।
जब एडविना का ताबूत समुद्र में उतारा जा रहा था, तब भारतीय युद्धपोत आईएनएस त्रिशूल से मैरीगोल्ड यानी गेंदा फूलों की माला समुद्र में प्रवाहित की गई। कहा जाता है कि यह निर्णय स्वयं नेहरू ने लिया था ताकि एडविना की अंतिम यात्रा में भारत की ओर से सम्मान व्यक्त किया जा सके। इस घटना ने यह प्रश्न खड़ा किया कि आखिर इस रिश्ते की गहराई क्या थी? जिसने एक संप्रभु देश के प्रधानमंत्री को अपने नौसैनिक जहाज को एक विदेशी महिला के अंतिम संस्कार में भेजने के लिए प्रेरित किया।
27 मई 1964 को नेहरू का निधन हुआ, लेकिन आज भी नेहरू और एडविना माउंटबेटन की कहानी इतिहास, राजनीति और निजी जीवन के जटिल संबंधों का प्रतीक मानी जाती है। साथ ही यह सवाल भी उठाता है कि जब देश स्वाधीनता के संघर्ष और विभाजन की त्रासदी से गुजर रहा था, तब सत्ता के उच्चतम स्तर पर चल रही निजी कहानियां किस तरह चर्चा का विषय बन गईं। एडविना की समुद्री विदाई में आईएनएस त्रिशूल की मौजूदगी ने इस कहानी को इतिहास में एक स्थायी प्रतीक बना दिया।

